गाँव में एक कहावत है, किसी की आह मत लो,
और ये आधुनिक लोकतंत्र, साम्यवाद, वाम, दक्षिण, हिंदी, हिन्दू, संस्कृति, सभ्यता सब का सब ‘लोग’ एवं उनके ‘लोक’ को कुचलकर बना है|
ये कितनी भी कोशिश कर लें, पर कभी सुकून से नहीं रह सकते|
चाहे मोदी भगाओ, राहुल लाओ, चाहे गोडसे को गरियाओ या नेहरु को पूजो कुछ नहीं होगा|
जे.एन.यू. से सेक्युलरिस्ट को हटाकर हिंदुवादियों को बिठाओ, तब भी कुछ नहीं होगा|
धर्मनिरपेक्षता तो नहीं हो सकती भारत में, पर आप जिस धर्म की बात कर रहे है उसके सापेक्ष भी नहीं है ये देश|
जिस धर्म के सापेक्ष ये देश था, वो न गीता में है, न कुरान में,
वो लोगो के जीवन में और उनके लोक में बसता था|
पर उसको आपने कुचल दिया, अब बहुत देर हो चुकी है|
जिन लाखों करोड़ो लोग को कुचलकर और उनके हजारों लोक को खत्म कर आपने ये राष्ट्र, भाषा और संविधान बनाया है, उसको ये आहे कभी सुकून से नहीं रहने देंगीं|
और इसी कुचलने की आवाज को नक्सलवाद जैसे नाम दिये जाते है…….