चलो अच्छा हुआ, भगवान को न्याय मिल, अब कम से कम भगवान अपने घर ‘में’ रहेंगे| ये मिला है मुझे,
कुछ 50 से ज्यादा लोगों से बात करके पिछले 10-12 दिनों में यानी मंदिर निर्माण होने जा रहा है तब, और लगभग 100 लोगों से बाबरी मस्जिद का निर्णय आने के बाद| थोड़ा इटेंट के साथ ये बातचीत करी है | ये वो लोग हैं जिन्हें मैंने राम और मंदिर के बड़े करीब देखा है | हाँ, किसी राजनीतिक दल से कोई विशेष संबंध नहीं है, चुनाव के अलावा कोई विशेष राजनीतिक विचार नहीं है | और वो भी कई घटकों के अनुसार बनते, बिगड़ते, बदलते रहें हैं | जैसे – अलग स्तर के चुनावों में अलग प्रत्याशी, पार्टी, जाति, रिश्तेदारी, आदि……….
जैसे – जैसे मैं बड़ा हो रहा था, साथ में सांप्रदायिकता भी बड़ी हो रही थी | बचपन में तो कुछ ज्यादा याद नहीं है | पर जबसे याद आता है लगभग ३-४ साल की उम्र से, उस्ताद मामा, अकलीम चच्चा और शरीफ चाचा ये तीन लोग सबसे करीब के मुसलमान थे| और कभी – कभी जुबैर आते थे, मम्मी के बहुत डांटने के बाद भी उनको चाचा नहीं बोला, थोड़ा बड़ा होने पर बोलने लगा था | उस्ताद मामा मेरे नाना के घर पर आते थे, पठानी शैली का कुर्ता – पायजामा पहनते थे, दाढ़ी रखते थे जिससे मैं बहुत डरता था, और वो रिश्ते के पद से वो मज़ाक भी करते थे | मैं हमेशा घर में छुप जाता था, कुछ भी बदमाशी करने पर मम्मी उनका नाम लेकर डरा दिया करती थी | हमेशा एक बहुत ही चमकती हुई साइकिल से आते थे | ये मेरे लिए आज तक आश्चर्य का अंजान विषय है कैसे हमेशा इतनी चमकदार साइकिल, क्या हमेशा नई लेते थे ? ज्यादा कुछ तो नहीं पर उनका खाने का बर्तन अलग था और मैं हमेशा उसी में खाने के लिए रोता था, पर जब लोग ये बोल दे उस्ताद का है तो डर कर रोना बंद कर देता था, क्यों कि वो आएंगे और पकड़ ले जाएंगे | आते थे तो खाना जरूर ही खाते थे | जब नानी का इंतकाल हुआ तब घर आए और बहुत रोए, मम्मी से बोले, बच्ची आज हमाय अम्मा चली गई, अब का करी | बहुत बाद में यानी लगभग १२ वीं कक्षा में पढ़ते हुए पता चला उनका नाम उस्ताद नहीं है, वो उनका पेशा है, पहलवानों का परिवार है, पहलवानी सिखाते हैं, इसलिए उस्ताद कहते हैं | तब तक उनसे डरना भी छोड़ दिया था | अब समझ आया है कि ‘उस्तादी’ हिंदुस्तान की एक बहुत ही खूबसूरत और समृद्धशाली पर टूटती बिखरती, अपनी अंतिम साँसे गिनती हुई शिक्षण परंपरा (pedagogical tradition) है| और अब तो शायद कहीं बाहर ये बात बोल दूँ तो लोग तुरंत वामपंथी, नक्सल, पाकिस्तान परस्त, मुसलमान, और बिल्कुल पिछड़ा, सपने में जीने वाला, तो बोलेंगे ही और इसके साथ जो लोग मेरे हितैषी बनते है वो मुझे जीवन की सच्चाई और प्रैक्टिकलटी का ज्ञान पिला देंगे|
दूसरे अकलीम चाचा पापा के खासमखास हैं, कुछ भी होने से छोटी – छोटी सी बात होने पर भी एक दूसरे को याद करते हैं | शरीफ का नाम कुछ और था पर लोग उसे शरीफ बोलते थे, क्यों कि वो इतना शरीफ था | मेरे घर में रहने वाले मिश्रा चाचा के गैरेज में काम करता था | और वहीं पर रहता था | हालाँकि, बाद में कुछ अलग तरह के घटनाक्रम हुए यानी कि हम महान उच्च जाति हिंदुओं के कुछ आपसी मुद्दे, जहाँ मिश्रा चाचा को व्यापार और उनकी जमीन से बेदखल करने की साजिश हुई थी | और वो उसमें हमारे न्याय प्रिय विरोधियों का एक औज़ार बन गया था | किसी तरह से घर के लोगों ने मामला सुलझा लिया था और इसके बाद शरीफ कभी भी उनके गैरेज पर काम नहीं किया, बस आता जाता था | जुबैर भी चाचा के यहाँ ही आता जाता था, और किसी भी अन्य आने जाने वाले व्यक्ति से ज्यादा खास थे | और तब हम बहुत छोटे हुआ करते थे तो इन लोगों से एक अभिभावक जैसा ही संबंध होता था | बस दुलार – पुचकार का, और हमेशा कुछ न कुछ ‘चीज’ देते रहते थे|
इन सबके ऊपर थे मेरे स्कूल बस के कंडक्टर मोबीन जिनको पूरा अमेठी क्या बूढ़ा क्या बच्चा सब मोबीन ही कहते थे| और हम भी मोबीन कहते हैं तब वो अधेड़ हुआ करते अब तो बुड्ढे हो गए हैं | हमेशा स्कूल ले जाना हर बात की जिम्मेदारी और सबसे ऊपर कुछ भी इधर उधर किया नहीं कि तुरंत उनके हाथ में चपेट में आ जाया करते थे | तो कितना भी प्यार हो पर डर भी रहता था | थोड़ा दूर से ही बात करते थे हालाँकि वो हमेशा पास बुलाते रहते थे | पर उसका कुछ भी बहुत सटीक और ठोस सबूत दे पाना मुश्किल है क्यों कि वो बाल मन था | वैसे मेरा मन अब भी बाल मन ही है वैसे ही चपल, चंचल, उदण्ड या एक शब्द में बोलूँ तो “अपनमना” है | ये सब इसलिए याद आ रहा है, क्यों कि इतने साल या मेरी पूरी परवरिश इस सबके बीच हुई थी | और कभी भी इतना अंतर, हिंसा, अलगाव नहीं देखा | जिस तरह से आज देख रहा हूँ |
इसके साथ अगल बगल सबकुछ ऐसा ही था, अच्छा – बुरा, ऊपर – नीचे | हर समुदाय से गुंडे – लफंगे, अपराधी| पर एक तुलना करूँ जनसंख्या के आधार पर तो कट्टरता ज्यादा दिखने लगी थे परंतु ऐसा नहीं है की कोई उसमें कोई कम था क्या हिन्दू क्या मुसलमान | परंतु हिन्दू के पास बाइ डिफ़ॉल्ट अपने आपको स्थापित करने की, अपने आपको को सही दिखाने की सहूलियत है | मुसलमान अपने में चाहे जो हो पर बड़े स्तर पर दब ही जाते है | भले हमारे भोलू लिबरल्स कितना भी अपनी चयनित संवेदना इनके प्रति दिखाते हों| और मेरे समाज में एक अलग धर्म से ज्यादा एक जाति की तरह से मुसलमान थे | उतना ही न्याय – अन्याय जितना किसी और के लिए थी | हालांकि आज सब विशेष और अलग हो रहा है |
आज जब मंदिर बन रहा है तब मैं किसी भी प्रकार के आस्था के सैलाब को विशेष रूप से नहीं देख पा रहा हूँ, इस बात का जिक्र इसलिए जरूरी है क्यों कि आस्था को ही आधार बनाया गया था | मुस्लिम आक्रांताओं ने हिन्दू आस्था एवं प्रतीकों को कुचला था | हो सकता है ऐसा हुआ हो या चलिए मानता हूँ हुआ ही था | फिर भी में एक हिन्दू होने के नाते के अपराध बोध से ग्रसित हूँ, क्यों ?
न मुझे संघ से द्वेष न मुझे वामपंथ से कोई प्यार है न मुसलमानों का मसीहा बनने का कोई शौक है| बल्कि, वामपंथ और दक्षिणपंथ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ये बात मुझे सैद्धांतिक व एकेडमिक तौर पर स्पष्ट होने के साथ – साथ जमीनी स्तर पर सबूतों के साथ स्पष्ट है | कैसे – कैसे दोनों ने ही जमीन पर राजनीतिक – आर्थिक रूप से गठजोड़ किया है और एक विशेष प्रकार की संस्कृति पैदा कर दी है | इस सबका प्रत्यक्ष दर्शी हूँ और जरूरत पड़ने पर बहुत ही सहज – सुलभ सबूतों और उदाहरणों के आधार पर साबित कर दूंगा | न केवल चुनावी राजनीति में बल्कि अन्य आयामों को लेकर भी और चुनावी राजनीति पर विशेष जोर इसलिए है क्यों कि आज के परिप्रेक्ष्य में उसे मैं सबसे सशक्त मानता हूँ |
मुझे न मंदिर बनने की कोई खुशी है न अफसोस, उसके पीछे मेरे हिसाब से पिछले कुछ वर्षों में मेरे अंदर विकसित हुई कुछ नई आदतों और इच्छाओं की भी भूमिका है | जैसे अब मैं ज्यादातर समय अकेले रहना चाहता हूँ, बस अपना काम खत्म कर चुपचाप कुछ पढ़ना सोचना चाहता हूँ | किसी तरह के social glorification से एकदम दूर रहना चाहता हूँ | यहाँ तक थोड़ी भी भीड़ वाली जगह पर जाना बिल्कुल नहीं पसंद है | और वैसे भी इन स्मारकों, चिन्हों, अस्मिता गान आदि में मैं कभी कुछ विशेष अच्छा नहीं देखता हूँ | एक अच्छे श्रोत्र हैं भूत की व्यवस्थाओं और परिस्थिति और गति को समझने के लिए | वैसे मेरी इस आदत को सामूहिक तौर पर अभी भी नहीं स्वीकार किया गया है | इसे अपनी सुविधा के अनुसार अलग – अलग श्रेणी में डालकर देख लिया जाता है | और मंदिर को लेकर कोई खुशी या गम न होने का एक कारण ये भी है, मैं अपने आप से, अपने जीवन और अपने सामाजिक अनुभवों से कोई विशेष जुड़ाव नहीं देख पा रहा हूँ | हालाँकि ये reclaiming process होना ही था परंतु बड़ा ही अजीब हो गया है | बाकी इसमें मैं किसी विशेष का कोई दोष नहीं देखता हूँ | सबने राष्ट्र की सत्ता और देश पर कब्जे की नशे में इसका इस्तेमाल लिया और बढ़ावा दिया है | न तो मैंने बाबरी का विध्वंस पर कभी अपनी कोई प्रतिक्रिया देखी है और न ही मंदिर निर्माण पर कोई विरोध या सहयोग है| ये सब काल – चक्र है, चलता रहेगा, कोई राजा, कोई फकीर, कोई रंक, कब कौन क्या हो जाए ये तो ऊपर वाला ही जानता है |
हम कुछ भी कहें पर ये बाते मैं empirically बोल सकता हूँ आज से 30-40 साल पहले हमारी स्थिति ज्यादा सही थी और हम कुछ नहीं कर सके तब आज तो स्थिति लगभग खो गई है सबकुछ गति आधारित हो चुका है| और हमारा पूरा का पूरा ध्यान “हिंसा” में है | सबसे बड़ी हिंसा है अपने विचार और अनुभव दूसरों को इस्तेमाल के लिए देना या थोपना भी कह सकते हैं | और हम देख सकते है किस तरह ‘मॉडलवाद’ का धंधा फल फूल रहा है | जिस धड़े की जिम्मेदारी सामाजिक एकता, सरसता और चेतना निर्माण की थी वो mercy और identity की politics करने में लग गया | अजीब तरह के scheme और scam में जन मानस को बांध दिया गया | आज भी कोई स्पष्टता नहीं है | मंदिर बने या न बने? धर्म और राजनीति कहाँ है इन दोनों का क्या संबंध है? हमारी आज की समकालीनता क्या है ? आखिर क्यों जिनको एक कहा जाता है वो एक दूसरे के खिलाफ है ? कौन हैं वो लोग जिनको मंदिर बनने से फर्क पड़ेगा ? और किस तरह का फर्क पड़ेगा ? जैसे अहम मुद्दों को न संबोधित कर एक abstract terms में बात चल रही है | तो कभी मंदिर पाचख में बन रहा है तो कभी कोरोना, तो कभी बेरोजगारी, कभी कुछ और…. और इन बातों से कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है | आप है कहाँ ? क्या समझूँ आपको? और यही असमंजस की स्थिति इन्होंने हमेशा बनाए रखी है | जबकि दूसरे धड़े की पूर्ण स्पष्टता है | और वैसे भी देश ने ऐसे दौर कई बार देखे थे, इसके पहले भी अलग – अलग तरह की राजनीति का नाम लेकर भी खूब खेल हुआ है | धर्म के साथ जब – जब चुनावी राजनीति की व्यवस्था को जोड़ा गया तब परिणाम घातक ही रहें हैं | इस गठजोड़ को इस्तेमाल करने में कुछ भी होने से, धर्म निरपेक्षता के मौत की बात भी इसी राजनीति का हिस्सा है|
और इस पूरे घटना क्रम में जिस प्रकार की हिंसा, नफरत, झूठ का कारोबार फैल गया है, उसको सुधार करना एक प्रमुख चुनौती है | ऐसी ताकतें जो कुछ भी समाज के पास ठोस होता है उसको तोड़कर टुकड़े – टुकड़े कर देती है | इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ साधारण दांव पेंच के रूप में देखना भी भोलापन ही है | इस सबके पीछे बहुत ही सशक्त और शैतानी प्रवृति की ताकतें बैठी हुई है | ये सब कुछ वैश्विक राजनीति – अर्थनीति से अलग नहीं है | या सरल शब्दों में कहें तो वैश्विक वित्तीय पूंजी और नव – उदारवादी हमलों से अलग नहीं है | इन सबके पीछे यही ताकतें हैं और ये सदियों से अपने काम पर अनवरत लगी हुई हैं | अलग – अलग देशों में अलग – अलग तरह के नाम इनसे जुड़े हुए हैं | जो देशों की राजनीति, समाज और सत्ता को कब्जा करते हैं | और शायद अंत में सब एक किसी सर्व शक्तिमान की सेवा में है | मंदिर मस्जिद हिन्दू मुस्लिम बस साधन हैं | इस घर्षण से निकली हुई चिंगारी और उससे बनी आग ऐसी ताकतों की सेना है | मनुष्य का अमानुषीकरण किया जाता है | और आज वही हो चुका है या होता ही जा रहा है | बाकी लड़ाई – झगड़ा, भेद – मतभेद चलता रहता है|
अब आवश्यक प्रश्न है, आगे क्या ? जब ये हिंसक मानसिकता लगभग पूर्ण रूप से सामान्य हो चुकी है | जब इंसान अपने धर्म को भी दूसरे के चरणों में चढ़ा चुका है | जब धर्म – राष्ट्र, न्याय का मतलब एक शैतानी सत्ता की चाटुकारिता और स्वीकृति हो | जब कुछ भी सोचने – बोलने पर आपके सामने भूत लाकर खड़ा कर दिया जाता है | वैसे हमें भूत को नकारना नहीं चाहिए परंतु कब और कितना और कैसे देखना चाहिए ये भी निश्चित होना चाहिए | और इस तरह की ताकते बड़ी आकर्षक होती है विशेषकर हमारे परिप्रेक्ष्य में जब एक बड़ा और सशक्त वर्ग जिसे हम मोटे तौर शहरी पढ़ा लिखा हिन्दू उच्च जाति मध्य वर्ग कह सकते हैं | और यहाँ शब्दों को पकड़ने की कोई जरूरत नहीं है बस एक सूचक हो सकता है| ये वर्ग अपने आपको self-victimize करने लगा है जबकि असल में इसे कोई समस्या नहीं है| परंतु ये अपने को सबसे ज्यादा शोषित मानता है और इस तोड़ने वाली ताकत में अपना उद्धार देखता है |
भविष्य की एक स्पष्ट झलक अभी इसी मंदिर कार्यक्रम में थी | जहाँ देश का लोकतंत्र एक अनाम, गैर – पंजीकृत संगठन के नीचे और पीछे आ गया था | यही सत्य है आज का…… बाकी संविधान संसद न्यायपालिका कार्यपालिका आदि से विशेष उम्मीद न ही करी जाए ये सारा वितंडा इनके ही आदेश से, संरक्षण से चल रहा है | ये सबकुछ संविधानिक ही है | थोड़ा बारीकी से देखिए………… और इसे देखे बिना कुछ भी करना बेकार है | हम कुछ भी करें सबकुछ इसी अनाम संगठन की सेवा है | पूरा स्टेडियम इन्हीं का है……..