पगलैट: पागल

अपने फैसले यदि हम खुद नहीं लेंगे तो कोई और ले ही लेगा|

कितने दिनों बाद इस एक लाइन ने जीवन की पूरी सच्चाई से वाकिफ दिया है| वैसे तो तकनीकी तौर पर पगलैट और अच्छी हो सकती है| पर जिस सहज ढंग निम्न मध्य वर्ग कि कुंठा और अशान्ति कि दास्तान को उमेश ने पर्दे पर उकेरा है वो किसी को भी एक बार अंदर तक झकझोर देगा|

पिक्चर की शुरुआत ही एक युवा की मौत और उसकी पाँच माह पहले ब्याही गई विधवा से होती है| मौत के बाद होने वाले तमाम पांखड़, रीति – रिवाज का गोरखधंधा, जबरदस्ती का पिंडदान, खोखले गरुण पुराण का खोखला रस भरा पाठ, धार्मिक आडंबरों को दिखाते हुए फ्रेम के केंद्र में एक विधवा लड़की है| एक तरफ लड़के के माँ – बाप अपने दुख में दबे हुए हैं| तो दूसरी तरफ सारे रिश्तेदार अपनी आपस की नोक झोंक, जलन, नीचा दिखाने की कोशिश से लेकर सूतक के खाने तक कि शिकायत उनसे कर रहें हैं|

इस सबके बीच इन्श्योरेन्स का एक 50 लाख का चेक है| जिसने मानव संवेदनाओं की सभी हदों को तोड़ दिया है| लड़की चेक की नॉमिनी है और यहीं से उसका भाग्य फूटने के साथ आत्म ज्ञान का पुनर्जन्म का रास्ता भी खुलता है| समाज व्याप्त भ्रष्टाचार और उसके प्रति स्वीकर्यता और इस्तेमाल की ललक दिखने के साथ – साथ परिवारों में पैठी हुए सड़ी – गली मानसिकता साफ झलकती है| महिला को पैरों कि जूती से अधिक नहीं सोच पाने कि व्यवस्था में महिलाओं के योगदान भी को बड़े अच्छे ढंग से पिरोया गया है| कहानी में बड़े ही सुंदर तरीके से एक युवा विधवा लड़की के पीहर, ससुराल, रिश्तेदारों के व्यवहार, स्वार्थ और बीमाधन की आकांक्षा में एक जवान विधवा लड़की कि जिंदगी को मोड़ने कि भ्रष्ट कला को पिरोया गया है|

और सबसे रोचक बात ये है कि तेरहवीं पर मृतक आत्मा का क्या होता है ये तो नहीं पता पर जीवित शरीर सभी बंधनों को तोड़कर उड़ जाता है| फिल्म को अनूठा बनाती है उसकी केंद्र बिन्दु| जहाँ 13 दिन के तात्कालिक वैराग्य या विधवा के रुदन से ज्यादा अंत में सारे बंधन तोड़कर, पचास लाख का चेक मुँह मारकर पक्षी आकाश में नए कि खोज में उड़ जाता है| “अज्ञान के अँधेरों से ज्ञान के उजाले की ओर” सा विद्या या विमुक्तते….

लड़की पढ़ा लिखा होना और आर्थिक संबलता हासिल करने के मौके ने उसको इस घुटन कि काल कोठरी से आजाद कर दिया| इसी समाज में सदियों तक सती प्रथा का पालन किया गया और भी कितनी बातें गिनवाई जाएं| अब आज ही एक महिला को पषड्यंत्र पूर्वक जलाने के अपराध को एक उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है| और इसके साथ – साथ हजारों सालों से समाज को पोषित करने वाली लाखों महिलाओं के विपरीत मौसम में, ठंड में हाड़ गला देने वाली हवा को झेलते हुए खेत में अपने को जमा देने वाली महिलाओं कि खुशी के चंद लम्हों का भी अपहरण कर लिया है|

स्वराज : पुनर्स्थापना

इस वर्ष में शायद अपने जीवन में पहली बार मुझे अफसोस हुआ है| ताला बंदी की वजह से एक कभी न खत्म होने वाला सूनापन आ गया, और पहली बार इस तरह से घर से में बंद हुआ, अन्यथा तो मुझे याद नहीं सोने के अलावा कभी कमरे में चार – छ घंटे रहा हूँ| पर इस सबके बीच बहुत समय मिला, पढ़ने – लिखने, सोच – विचार, चिंतन – मनन, जानने – समझने आदि का अभ्यास करने के लिए| और इसी से अफसोस पैदा हो गया है| हमारे इन कुमति जन्य प्रयोगों का गंतव्य क्या है?

इस साल के और शायद मेरे पूरे जीवन के सबसे खूबसूरत एहसास हिन्द स्वराज, जॉन रस्किन और आनंद कुमारस्वामी को पढ़ते हुए हैं| कुछ चीज़ें वन्स इन अ लाइफ होती है और ये अनुभव वैसे ही हैं| यहाँ से जीवन को एक बहुत महत्वपूर्ण मोड़ मिला है|

मैं कभी भी मौजूदा डिस्कोर्स से अपने आपको नहीं जोड़ पाया, उपलब्धि के नाम पर भारी असफलता ही है, successful failure हूँ| और इसके पीछे किसी प्रकार का कोई झुकाव, या प्रशिक्षण, या विचारधारा जैसा कुछ नहीं रहा है, बल्कि ये आधुनिक बातें कभी जमी नहीं, विशेषरूप से भारतीय परिप्रेक्ष्य की व्याख्या, विश्लेषण करने के लिए, परिभाषित करने के लिए| सोने की चिड़िया वाली सोच भी कभी हजम नहीं कर पाया हूँ| ये दोनों ही अतिवाद है जो असल में आधुनिकता से ही निकल रहा है|

एक बहुत सहज बात शुरू से ही जेहन में आती रहती है| कोई भी समाज या व्यवस्था काल के प्रवाह एवं प्रभाव में आकर, प्रभावित होकर भ्रष्ट और विकृत हो ही जाती है| कुप्रथाएँ, कुरीतियाँ, सामूहिक रूप से पोषित होने लगती हैं, सामाजिक ढांचे दमन का औजार भर बनकर रह जाते हैं, अन्याय व्यवस्थागत तरीके से पोषित होने लगता है| संस्थान अपने सम्यक उद्देश्यों से विचलित होने लगते हैं| व्यक्ति एवं समूह की बुद्धि वासना में स्थापित हो जाती है, निज स्वार्थ प्रधान हो जाता है| और विकृतियों को पोषित करने के लिए ‘कुतर्क’ गढ़े जाने लगते हैं|

गांधी जी ने ऐसी ही हिंसक विकृति से सामना होने के बाद अपने अंदर के अंधड़ से संघर्ष करते हुए हिन्द स्वराज को जन्म दिया| जहाँ उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता के हिंसक और शैतानी प्रवृत्तियों को उसकी तात्विक पूर्णता में प्रस्तुत किया| और हमारे ऊपर किये जा रहें आक्रमण को समझा| जिसे उस समय भी देश का शक्तिशाली तबका एक सुधारवादी, उदारवादी आर्थिक – राजनीतिक दर्शन के रूप में ग्रहण और प्रस्तुत कर रहा था| व्यवस्थाओं के सम्यक उद्देश्यों की बिना किसी समझ एवं कालचक्र के फेर में से उसमें आई कुरीतियों से पैदा हुई विद्रूपता और विकृति को समझे बिना निराकरण के नाम पर संस्थानों में, ढांचों में रद्दोबदल, कुमति पूर्ण प्रयोगवाद चल रहा था| इससे कोई वांछित परिणाम नहीं आना था, अपितु व्यवस्था व समाज में और चरमराहट पैदा हो गई| असल में वहाँ पर हमारे अंदर एक सामूहिक हीनता की चेतना डाली जा रही थी| हमारी अपनी सभ्यता, व्यवस्था एवं समाज पर सिर्फ आक्षेप लगाए जा रहे थे, दोषारोपण एवं तिरस्कार किया जा रहा था|

गांधी जी ने इस कुचक्र का उसकी व्यापकता में एहसास कर लिया था| हिन्द स्वराज में उन्होंने मानव सभ्यता की रक्षा में पाश्चात्य साम्राज्यवादी आधुनिकता से बड़े ही विलक्षण ढंग से संवाद किया| जहाँ न केवल आधुनिकता की तात्विकता एवं व्यवहारिकता में जाकर उसकी वैज्ञानिक एवं सामाजिक दोनों तरह की अवधारणाओं की तीखी आलोचना करी, अपितु समानांतर रूप से उसके समाधान के लिए परंपरा की जड़ों को परिष्कृत रूप में स्थापित किया| बदहाल देश को उसके सहज हाल पर लाने के लिए, विदेशी आक्रमणों से रक्तरंजित एवं आंतरिक कलह से घायल सभ्यता के उपचार हेतु परम्परागत चिंतन करते हुए, ‘बुद्धि परिष्कार’ की प्रक्रिया को पुनः आम जन मानस की चेतना में स्थापित किया जो उनके पूरे जीवन काल में प्रतिबिंबित है एवं हिन्द स्वराज का अंत इसी दृढ़ प्रतिज्ञा के साथ करते हैं| संस्थानों, ढांचों को समाप्त करने या मौलिक परिवर्तन के खोखले प्रयोगवाद को नकारते हुए, कृत्रिमता को विकृति की जननी मानते हुए गांधी जी ने दृष्टि सुधार की गहन साधना पर ध्यान किया|

गांधी जी ने पाश्चात्य दर्शन के घोर भौतिकवादी रवैये और आम इंसान को एक टुकड़ा रोटी, चिथड़ा भर कपड़े के जाल में बांध देने की साजिश व अंतर्विरोध को बड़ी ही बारीकी से हिन्द स्वराज में जन मानस के सामने रखा है| पारंपरिक व्यवस्था में इन आवश्यकताओं को पूर्ण करने की सुदृढ़ व्यवस्था थी| परंतु उस दस्तकारी की कला का नाश कर न केवल हमारी राष्ट्रीय संपदा का नाश किया बल्कि संस्कृति को भी समाप्त किया एवं हम “अराष्ट्रीय” होकर खड़े हो गए| और हमारा अभिजात्य, उदारवादी एवं spiritual bastards का तबका साम्राज्यवादियों से ही हमें सभ्य – संस्कारी, शिक्षित बनाने की, गरीबी दूर करने के लिए औद्योगीकरण एवं भौतिकवादी दर्शन को ही स्थापित की गुहार लगाने लगा था| इस संविभ्रम (paranoia) काल को गांधी जी ने हिन्द स्वराज में बड़े ही इत्मीनान से समझाया है और साथ में आम लोगों को एक सम्यक दृष्टि (metanoia) का भी वरदान दिया; “स्वराज” का|  

जहाँ जीविका, उत्पादन, अर्थ जैसे तात्कालिक पर जरूरी सवालों को ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ के विराट परिप्रेक्ष्य में समझाया गया है, हल किया गया है| जहाँ उत्पादन एक सम्यक संतुष्टि के लिए है न कि मुनाफे के लिए| भौतिक जरूरतों को संयमित करने, मात्रकता की जगह गुणात्मकता पर ध्यान देना, श्रम कला है न कि मजदूरी, कार्य करना पूजा है गुलामी नहीं| आर्थिक, उत्पादक क्रियाएँ उच्चतर उद्देश्यों की पूर्ति के लिए साधन है न कि स्वयं में साध्य या स्वतंत्र हैं| परंपरा में ये प्रक्रियाएं (आर्थिक, औद्योगिक) केवल पेट भरने का साधन नहीं है अपितु आत्मानुभूति की उपकरण है| उनकी प्रखर अंतर्दृष्टि ने इन पहलुओं का व्यापक अनुभव किया और यही बात आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के वीभत्स अमानवीय और घोर अनैतिक पक्षों का पूर्ण रूप से उजागर कर देती है| हालाँकि इस बात को न ही उदारवादी पूंजीवाद और न ही साम्यवाद समझ पाएगा| क्यों कि हिन्द स्वराज में गांधी जी की जमीन, वह शाश्वत दर्शन (philosophia perennis) है जो परंपरागत संस्कृतियों का प्रस्थान बिन्दु रहा है, तर्कों और युक्तियों की भावभूमि है| और ये दर्शन इन दोनों ही व्यवस्थाओं को तात्विक रूप से खंडित करता है|

हिन्द स्वराज एक सच्चे अर्थों में “reform” का महा ग्रंथ है, जहाँ गांधी जी ने पाश्चात्य सभ्यता की आलोचना तो करी है| पर उससे भी महत्वपूर्ण प्रयास भारतीय सभ्यता के मूल स्वरूप में जो विचलन आए थे उन पर सभ्यतागत चिंतन की परंपरा से ही संकल्पना करी व उसे दूर कर भारतीय सभ्यता के मूल स्वरूप की पुनः प्रतिष्ठा करी है|  

मंदिर : एक प्रतिबिंब

चलो अच्छा हुआ, भगवान को न्याय मिल, अब कम से कम भगवान अपने घर ‘में’ रहेंगे| ये मिला है मुझे, 

कुछ 50 से ज्यादा लोगों से बात करके पिछले 10-12 दिनों में यानी मंदिर निर्माण होने जा रहा है तब, और लगभग 100 लोगों से बाबरी मस्जिद का निर्णय आने के बाद| थोड़ा इटेंट के साथ ये बातचीत करी है | ये वो लोग हैं जिन्हें मैंने राम और मंदिर के बड़े करीब देखा है | हाँ, किसी राजनीतिक दल से कोई विशेष संबंध नहीं है, चुनाव के अलावा कोई विशेष राजनीतिक विचार नहीं है | और वो भी कई घटकों के अनुसार बनते, बिगड़ते, बदलते रहें हैं | जैसे – अलग स्तर के चुनावों में अलग प्रत्याशी, पार्टी, जाति, रिश्तेदारी, आदि……….

जैसे – जैसे मैं बड़ा हो रहा था, साथ में सांप्रदायिकता भी बड़ी हो रही थी | बचपन में तो कुछ ज्यादा याद नहीं है | पर जबसे याद आता है लगभग ३-४ साल की उम्र से, उस्ताद मामा, अकलीम चच्चा और शरीफ चाचा ये तीन लोग सबसे करीब के मुसलमान थे| और कभी – कभी जुबैर आते थे, मम्मी के बहुत डांटने के बाद भी उनको चाचा नहीं बोला, थोड़ा बड़ा होने पर बोलने लगा था | उस्ताद मामा मेरे नाना के घर पर आते थे, पठानी शैली का कुर्ता – पायजामा पहनते थे, दाढ़ी रखते थे जिससे मैं बहुत डरता था, और वो रिश्ते के पद से वो मज़ाक भी करते थे | मैं हमेशा घर में छुप जाता था, कुछ भी बदमाशी करने पर मम्मी उनका नाम लेकर डरा दिया करती थी | हमेशा एक बहुत ही चमकती हुई साइकिल से आते थे | ये मेरे लिए आज तक आश्चर्य का अंजान विषय है कैसे हमेशा इतनी चमकदार साइकिल, क्या हमेशा नई लेते थे ? ज्यादा कुछ तो नहीं पर उनका खाने का बर्तन अलग था और मैं हमेशा उसी में खाने के लिए रोता था, पर जब लोग ये बोल दे उस्ताद का है तो डर कर रोना बंद कर देता था, क्यों कि वो आएंगे और पकड़ ले जाएंगे | आते थे तो खाना जरूर ही खाते थे | जब नानी का इंतकाल हुआ तब घर आए और बहुत रोए, मम्मी से बोले, बच्ची आज हमाय अम्मा चली गई, अब का करी | बहुत बाद में  यानी लगभग १२ वीं कक्षा में पढ़ते हुए पता चला उनका नाम उस्ताद नहीं है, वो उनका पेशा है, पहलवानों का परिवार है, पहलवानी सिखाते हैं, इसलिए उस्ताद कहते हैं | तब तक उनसे डरना भी छोड़ दिया था | अब समझ आया है कि ‘उस्तादी’ हिंदुस्तान की एक बहुत ही खूबसूरत और समृद्धशाली पर  टूटती बिखरती, अपनी अंतिम साँसे गिनती हुई शिक्षण परंपरा (pedagogical tradition) है| और अब तो शायद कहीं बाहर ये बात बोल दूँ तो लोग तुरंत वामपंथी, नक्सल, पाकिस्तान परस्त, मुसलमान, और बिल्कुल पिछड़ा, सपने में जीने वाला, तो बोलेंगे ही और इसके साथ जो लोग मेरे हितैषी बनते है वो मुझे जीवन की सच्चाई और प्रैक्टिकलटी का ज्ञान पिला देंगे|

दूसरे अकलीम चाचा पापा के खासमखास हैं, कुछ भी होने से छोटी – छोटी सी बात होने पर भी एक दूसरे को याद करते हैं | शरीफ का नाम कुछ और था पर लोग उसे शरीफ बोलते थे, क्यों कि वो इतना शरीफ था | मेरे घर में रहने वाले मिश्रा चाचा के गैरेज में काम करता था | और वहीं पर रहता था | हालाँकि, बाद में कुछ अलग तरह के घटनाक्रम हुए यानी कि हम महान उच्च जाति हिंदुओं के कुछ आपसी मुद्दे, जहाँ मिश्रा चाचा को व्यापार और उनकी जमीन से बेदखल करने की साजिश हुई थी | और वो उसमें हमारे न्याय प्रिय विरोधियों का एक औज़ार बन गया था | किसी तरह से घर के लोगों ने मामला सुलझा लिया था और इसके बाद शरीफ कभी भी उनके गैरेज पर काम नहीं किया, बस आता जाता था | जुबैर भी चाचा के यहाँ ही आता जाता था, और किसी भी अन्य आने जाने वाले व्यक्ति से ज्यादा खास थे | और तब हम बहुत छोटे हुआ करते थे तो इन लोगों से एक अभिभावक जैसा ही संबंध होता था | बस दुलार – पुचकार का, और हमेशा कुछ न कुछ ‘चीज’ देते रहते थे|

इन सबके ऊपर थे मेरे स्कूल बस के कंडक्टर मोबीन जिनको पूरा अमेठी क्या बूढ़ा क्या बच्चा सब मोबीन ही कहते थे| और हम भी मोबीन कहते हैं तब वो अधेड़ हुआ करते अब तो बुड्ढे हो गए हैं | हमेशा स्कूल ले जाना हर बात की जिम्मेदारी और सबसे ऊपर कुछ भी इधर उधर किया नहीं कि तुरंत उनके हाथ में चपेट में आ जाया करते थे | तो कितना भी प्यार हो पर डर भी रहता था | थोड़ा दूर से ही बात करते थे हालाँकि वो हमेशा पास बुलाते रहते थे | पर उसका कुछ भी बहुत सटीक और ठोस सबूत दे पाना मुश्किल है क्यों कि वो बाल मन था | वैसे मेरा मन अब भी बाल मन ही है वैसे ही चपल, चंचल, उदण्ड या एक शब्द में बोलूँ तो “अपनमना” है | ये सब इसलिए याद आ रहा है, क्यों कि इतने साल या मेरी पूरी परवरिश इस सबके बीच हुई थी | और कभी भी इतना अंतर, हिंसा, अलगाव नहीं देखा | जिस तरह से आज देख रहा हूँ |

इसके साथ अगल बगल सबकुछ ऐसा ही था, अच्छा – बुरा, ऊपर – नीचे | हर समुदाय से गुंडे – लफंगे, अपराधी| पर एक तुलना करूँ जनसंख्या के आधार पर तो कट्टरता ज्यादा दिखने लगी थे परंतु ऐसा नहीं है की कोई उसमें कोई कम था क्या हिन्दू क्या मुसलमान | परंतु हिन्दू के पास बाइ डिफ़ॉल्ट अपने आपको स्थापित करने की, अपने आपको को सही दिखाने की सहूलियत है | मुसलमान अपने में चाहे जो हो पर बड़े स्तर पर दब ही जाते है | भले हमारे भोलू लिबरल्स कितना भी अपनी चयनित संवेदना इनके प्रति दिखाते हों| और मेरे समाज में एक अलग धर्म से ज्यादा एक जाति की तरह से मुसलमान थे | उतना ही न्याय – अन्याय जितना किसी और के लिए थी | हालांकि आज सब विशेष और अलग हो रहा है |

आज जब मंदिर बन रहा है तब मैं किसी भी प्रकार के आस्था के सैलाब को विशेष रूप से नहीं देख पा रहा हूँ, इस बात का जिक्र इसलिए जरूरी है क्यों कि आस्था को ही आधार बनाया गया था | मुस्लिम आक्रांताओं ने हिन्दू आस्था एवं प्रतीकों को कुचला था | हो सकता है ऐसा हुआ हो या चलिए मानता हूँ हुआ ही था | फिर भी में एक हिन्दू होने के नाते के अपराध बोध से ग्रसित हूँ, क्यों ?

न मुझे संघ से द्वेष न मुझे वामपंथ से कोई प्यार है न मुसलमानों का मसीहा बनने का कोई शौक है| बल्कि, वामपंथ और दक्षिणपंथ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ये बात मुझे सैद्धांतिक व एकेडमिक तौर पर स्पष्ट होने के साथ – साथ जमीनी स्तर पर सबूतों के साथ स्पष्ट है | कैसे – कैसे दोनों ने ही जमीन पर राजनीतिक – आर्थिक रूप से गठजोड़ किया है और एक विशेष प्रकार की संस्कृति पैदा कर दी है | इस सबका प्रत्यक्ष दर्शी हूँ और जरूरत पड़ने पर बहुत ही सहज – सुलभ सबूतों और उदाहरणों के आधार पर साबित कर दूंगा | न केवल चुनावी राजनीति में बल्कि अन्य आयामों को लेकर भी और चुनावी राजनीति पर विशेष जोर इसलिए है क्यों कि आज के परिप्रेक्ष्य में उसे मैं सबसे सशक्त मानता हूँ |  

मुझे न मंदिर बनने की कोई खुशी है न अफसोस, उसके पीछे मेरे हिसाब से पिछले कुछ वर्षों में मेरे अंदर विकसित हुई कुछ नई आदतों और इच्छाओं की भी भूमिका है | जैसे अब मैं ज्यादातर समय अकेले रहना चाहता हूँ, बस अपना काम खत्म कर चुपचाप कुछ पढ़ना सोचना चाहता हूँ | किसी तरह के social glorification से एकदम दूर रहना चाहता हूँ | यहाँ तक थोड़ी भी भीड़ वाली जगह पर जाना बिल्कुल नहीं पसंद है | और वैसे भी इन स्मारकों, चिन्हों, अस्मिता गान आदि में मैं कभी कुछ विशेष अच्छा नहीं देखता हूँ | एक अच्छे श्रोत्र हैं भूत की व्यवस्थाओं और परिस्थिति और गति को समझने के लिए | वैसे मेरी इस आदत को सामूहिक तौर पर अभी भी नहीं स्वीकार किया गया है | इसे अपनी सुविधा के अनुसार अलग – अलग श्रेणी में डालकर देख लिया जाता है | और मंदिर को लेकर कोई खुशी या गम न होने का एक कारण ये भी है, मैं अपने आप से, अपने जीवन और अपने सामाजिक अनुभवों से कोई विशेष जुड़ाव नहीं देख पा रहा हूँ | हालाँकि ये reclaiming process होना ही था परंतु बड़ा ही अजीब हो गया है | बाकी इसमें मैं किसी विशेष का कोई दोष नहीं देखता हूँ | सबने राष्ट्र की सत्ता और देश पर कब्जे की नशे में इसका इस्तेमाल लिया और बढ़ावा दिया है | न तो मैंने बाबरी का विध्वंस पर कभी अपनी कोई प्रतिक्रिया देखी है और न ही मंदिर निर्माण पर कोई विरोध या सहयोग है| ये सब काल – चक्र है, चलता रहेगा, कोई राजा, कोई फकीर, कोई रंक, कब कौन क्या हो जाए ये तो ऊपर वाला ही जानता है |   

हम कुछ भी कहें पर ये बाते मैं empirically बोल सकता हूँ आज से 30-40 साल पहले हमारी स्थिति ज्यादा सही थी और हम कुछ नहीं कर सके तब आज तो स्थिति लगभग खो गई है सबकुछ गति आधारित हो चुका है| और हमारा पूरा का पूरा ध्यान “हिंसा” में है | सबसे बड़ी हिंसा है अपने विचार और अनुभव दूसरों को इस्तेमाल के लिए देना या थोपना भी कह सकते हैं | और हम देख सकते है किस तरह ‘मॉडलवाद’ का धंधा फल फूल रहा है | जिस धड़े की जिम्मेदारी सामाजिक एकता, सरसता और चेतना निर्माण की थी वो mercy और identity की politics करने में लग गया | अजीब तरह के scheme और scam में जन मानस को बांध दिया गया | आज भी कोई स्पष्टता नहीं है | मंदिर बने या न बने? धर्म और राजनीति कहाँ है इन दोनों का क्या संबंध है?  हमारी आज की समकालीनता क्या है ? आखिर क्यों जिनको एक कहा जाता है वो एक दूसरे के खिलाफ है ? कौन हैं वो लोग जिनको मंदिर बनने से फर्क पड़ेगा ? और किस तरह का फर्क पड़ेगा ? जैसे अहम मुद्दों को न संबोधित कर एक abstract terms में बात चल रही है | तो कभी मंदिर पाचख में बन रहा है तो कभी कोरोना, तो कभी बेरोजगारी, कभी कुछ और….  और इन बातों से कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है | आप है कहाँ ? क्या समझूँ आपको? और यही असमंजस की स्थिति इन्होंने हमेशा बनाए रखी है | जबकि दूसरे धड़े की पूर्ण स्पष्टता है | और वैसे भी देश ने ऐसे दौर कई बार देखे थे, इसके पहले भी अलग – अलग तरह की राजनीति का नाम लेकर भी खूब खेल हुआ है | धर्म के साथ जब – जब चुनावी राजनीति की व्यवस्था को जोड़ा गया तब परिणाम घातक ही रहें हैं | इस गठजोड़ को इस्तेमाल करने में कुछ भी होने से, धर्म निरपेक्षता के मौत की बात भी इसी राजनीति का हिस्सा है|

और इस पूरे घटना क्रम में जिस प्रकार की हिंसा, नफरत, झूठ का कारोबार फैल गया है, उसको सुधार करना एक प्रमुख चुनौती है | ऐसी ताकतें जो कुछ भी समाज के पास ठोस होता है उसको तोड़कर टुकड़े – टुकड़े कर देती है | इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ साधारण दांव पेंच के रूप में देखना भी भोलापन ही है | इस सबके पीछे बहुत ही सशक्त और शैतानी प्रवृति की ताकतें बैठी हुई है | ये सब कुछ वैश्विक राजनीति – अर्थनीति से अलग नहीं है | या सरल शब्दों में कहें तो वैश्विक वित्तीय पूंजी और नव – उदारवादी हमलों से अलग नहीं है | इन सबके पीछे यही ताकतें हैं और ये सदियों से अपने काम पर अनवरत लगी हुई हैं | अलग – अलग देशों में अलग – अलग तरह के नाम इनसे जुड़े हुए हैं | जो देशों की राजनीति, समाज और सत्ता को कब्जा करते हैं | और शायद अंत में सब एक किसी सर्व शक्तिमान की सेवा में है | मंदिर मस्जिद हिन्दू मुस्लिम बस साधन हैं | इस घर्षण से निकली हुई चिंगारी और उससे बनी आग ऐसी ताकतों की सेना है | मनुष्य का अमानुषीकरण किया जाता है | और आज वही हो चुका है या होता ही जा रहा है | बाकी लड़ाई – झगड़ा, भेद – मतभेद चलता रहता है|

अब आवश्यक प्रश्न है, आगे क्या ? जब ये हिंसक मानसिकता लगभग पूर्ण रूप से सामान्य हो चुकी है | जब इंसान अपने धर्म को भी दूसरे के चरणों में चढ़ा चुका है | जब धर्म – राष्ट्र, न्याय का मतलब एक शैतानी सत्ता की चाटुकारिता और स्वीकृति हो | जब कुछ भी सोचने – बोलने पर आपके सामने भूत लाकर खड़ा कर दिया जाता है | वैसे हमें भूत को नकारना नहीं चाहिए परंतु कब और कितना और कैसे देखना चाहिए ये भी निश्चित होना चाहिए | और इस तरह की ताकते बड़ी आकर्षक होती है विशेषकर हमारे परिप्रेक्ष्य में जब एक बड़ा और सशक्त वर्ग जिसे हम मोटे तौर शहरी पढ़ा लिखा हिन्दू उच्च जाति मध्य वर्ग कह सकते हैं | और यहाँ शब्दों को पकड़ने की कोई जरूरत नहीं है बस एक सूचक हो सकता है| ये वर्ग अपने आपको self-victimize करने लगा है जबकि असल में इसे कोई समस्या नहीं है| परंतु ये अपने को सबसे ज्यादा शोषित मानता है और इस तोड़ने वाली ताकत में अपना उद्धार देखता है |

भविष्य की एक स्पष्ट झलक अभी इसी मंदिर कार्यक्रम में थी | जहाँ देश का लोकतंत्र एक अनाम, गैर – पंजीकृत संगठन के नीचे और पीछे आ गया था | यही सत्य है आज का…… बाकी संविधान संसद न्यायपालिका कार्यपालिका आदि से विशेष उम्मीद न ही करी जाए ये सारा वितंडा इनके ही आदेश से, संरक्षण से चल रहा है | ये सबकुछ संविधानिक ही है | थोड़ा बारीकी से देखिए…………  और इसे देखे बिना कुछ भी करना बेकार है | हम कुछ भी करें सबकुछ इसी अनाम संगठन की सेवा है | पूरा स्टेडियम इन्हीं का है……..        

संवाद : हिंसा के साथ….

एक तरफ सुकमा के गाँव हैं, जहाँ प्रत्यक्ष हिंसा है नक्सल गतिविधियां, सुरक्षा बलों की गश्त एवं दोनों पार्टियों द्वारा किए जाने वाले अनुचित कार्य, अनैतिक व्यवहार, एवं हिंसक गतिविधियां जैसे मार – पीट, या किसी को मार ही देना, महिलाओं के साथ होने वाली बदतमीजी एवं ज्यादतियाँ, बच्चों के मन में भयंकर दर डर पैदा करना आदि| दूसरी तरफ दोनों ही दल एक दूसरे के प्रति नफरत से भरे हैं तो इसी से संबंधी समझाईश गाँव वालों को देते हैं| फिर एक दूसरे पर जब प्रत्यक्ष हमले करते हैं तो उसका अपना पूरा एक विशेष चक्र होता है| गाँव में आने जाने वाले हर व्यक्ति के बारे में गाँव वालों से पूछताछ दोनों ही दल करते हैं | सुरक्षा दल थोड़ा सा कम करते हैं क्यों की उनके पास जो व्यक्ति गाँव में जा रहा है उससे सीधे सवाल, पूछताछ करने की आजादी है, अधिकार हैं |

अब अगर बच्चा यहाँ से बाहर निकलता है तो वो सिर्फ स्कूल हैं | स्कूल गांवों में भी है, आवासीय है, पर इन सब स्कूलों की एवं इसमें काम करने वाली व्यवस्था का हालत और भयंकर है | ऊपर से नीचे तक हर कोई भ्रष्टाचार में संलिप्त है | और ऐसा की वो मानवीय कल्पना के बाहर है | वो चाहे शिक्षक हो या मंत्री …… इसके साथ हद दर्जे का अमानवीय व्यवहार करते हैं बच्चों के साथ, ऐसा लगता ही नहीं है कि ये बच्चे भी जीव हैं | सुरक्षा बल, या और जो बड़े – बड़े वामपंथ के नक्सल के विरोधी है सबके मन में मैंने एक बार तो नक्सलियों के लिए भी संवेदना देखी है, बच्चों समुदाय आदि के लिए लगातार देखता हूँ | परंतु शिक्षकों एवं शिक्षा विभाग के पूरे अमले में सिर्फ नफरत, हिकारत ही देखता हूँ | तरस रहा हूँ कि एक बार बस एक बार इनकी आँखों में संवेदना देख लूँ |

इसके बीच आम ग्रामीणों की हालत बताने के लिए शब्द नहीं है | पंचायत का पूरे प्रतिनिधि आदि सब आला दर्जे के भ्रष्ट हैं |

अब इसके बीच कैसे आगे बढ़े | और इसे नजरंदाज भी नहीं किया जा रहा है अब……    

अब इसमें एक पेंच ये भी है कि, यहाँ का पूरा नेतृत्व बाहर से आया है और आज भी उन्हीं की हुकूमत चलती है | ये दोनों दलों के लिए एक बराबर लागू है | नक्सलियों का लगभग पूरा शीर्ष नेतृत्व आंध्र प्रदेश आया है | और सरकारी अमला तो बाहर वालों से भरा ही है | इसके बीच में स्थानीय लोग भी हैं, पर उन्हीं पदों पर जहाँ बाहर वाले नहीं आ सकते है | ये ऊपर से नीचे तक हर जगह हैं | और वो भी उसी रंग में रंगे हैं | इसमें एक बात जो मुझे परस्पर दिखती है, वो है, व्यवस्था | व्यवस्था कैसी है ? क्यों कि पहचान एक जरूरी अंग है परंतु कब तक और कैसे और कितना ? हमारी पहचान भी तो किसी की दी हुई ही है | एक व्यवस्था का ही अंग है | बल्कि यहाँ पर तो आदिवासियों की पूरी ही पहचान किसी और की दी हुई हो चुकी है | एक तरह से यहाँ का इंसान निरंतर बाहरी प्रभुत्व के दबदबे में रह रहा है |

और ये पहचान आधारित प्रवचन में कुछ बहुत मूलभूत दोष हैं | आधुनिकता और उसके बाद हमारे अनुभवों ने आदिवासियों को समझने वाली बहसों में गतिरोध उत्पन्न किया है | जाने अनजाने में विपरीत बहसों का आरोपण किया गया है | आधुनिक ज्ञान प्रणालियों की राजनीति ने अनजाने में ही सही परंतु स्थानीय संवेदनशीलता और ज्ञान को निरंतर अव्यवस्थित किया है; आदिवासी का हाशियाकरण करने में एक प्रमुख तत्व है | हर उस बहस से इसी तरह का अंधापन निकलता है जो अपने मूल से अव्यवस्थित होती है |

आदिवासी का दुनिया को देखने के नजरिया (विश्व दृष्टि) कभी लोक के नजरिए से ज्यादा अलग नहीं रहा है | अपनी विविधता के साथ हजारों वर्षों से

अगर मैं mainstream के हिसाब से भी सोचूँ और एकदम systems terms में रहूँ तब मोटी – मोटी दो बातें होंगी:

पहली जब राष्ट्र – राज्य की अवधारणा आई और इसके साथ पूरी दुनिया एक होने लगी है | तब करार राज्य और समाज के बीच हुआ और संविधान एक तरह का करारनामा है, सरकारें उसकी संरक्षक हैं | अब गैर – सरकारी संगठनों को ये निर्णय लेना है वो कहाँ है समाज, राज्य, या जो करार हुआ है उसके साथ, या करारनामे के साथ, या संरक्षकों के साथ…. थोड़ी स्पष्टता तो चाहिए हो जिससे सोचने और योजना बनाने में आसानी हो |

दूसरी बात, शिक्षा, साक्षरता को colonial fever से ठीक होकर सोचना होगा | जैसे अंग्रेजी भाषा के साथ मेरे हिसाब से भारत में सबसे बड़ी समस्या भारतीयों के द्वारा ही बनाई गई है | विश्व विद्यालय तक की पाठ्य चर्या में अंग्रेजी “लिखनी” नहीं सिखाई जाती है | मुझे लगता है वही समस्या सुकमा जैसी जगहों पर भी है | अगर मुझे बोलना हो तो मैं बोलूँगा कि सुकमा में शिक्षा या साक्षरता का मूल उद्देश्य होना चाहिए “अभिव्यक्ति” बच्चे अपने को अभिव्यक्त कर सकें, अपनी बात कह सके, अपने लिए आवाज खोजें और अपनी आवाज को हर चीज में देखने की कोशिश करें इसके बाद आगे बढ़े | तो इस हिसाब से किसी भी बात से ज्यादा हमें बच्चों को लिखना सिखाना होगा, पढ़ना सिखाना होगा | यानि कि आधुनिक शिक्षा के जो मूलभूत आधार है, जो meta idea हैं, कौशल हैं उन पर सीधे काम करना | बीच में कोई मध्यस्थ नहीं, कोई पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम, अधिगम स्तर, कौशल विकास जैसी कोई पंचायती प्रपंच नहीं होना चाहिए | ये एक तीर से कई निशाने लगाने वाली बात है .. .. पर बात ये है कि सामने एक सर्व शक्तिमान सत्ता है जिसे स्टेट कहते हैं और वो आपको कोई मौका नहीं देने वाला है, बस जब तक बन पड़ रहा है कुछ कर लीजिए | सबसे आवश्यक और ध्यान देने वाली बात है ये है कि इस बीच हम हिंसा की वकालत नहीं कर सकते हैं | क्यों कि अगर नागरिक हिंसा का प्रवक्ता हो गए तब स्टेट के पास क्या विकल्प बचेगा? और ये तो सब जानते हैं कि गोलियां उसी के पास ज्यादा हैं और उनको इस्तेमाल करने की प्रवृति भी यानी “अपराधी”……     

बचत : कितनी उचित

एक छोटी सी संस्था में बहुत मामूली वेतन पर काम करने के कारण शायद मैं कभी भी “बचत” के विचार को खरीद नहीं पाया| मैंने इस पर बहुत बारीकी से चिंतन किया, क्या है जो मुझे रोकता है? जहाँ एक तरफ मैंने पाया कि मेरे स्वभाव का आधुनिक न होना एक कारण है तो दूसरी तरफ मेरे स्वचिंतन की मीमांसा भी जिम्मेदार है | जहाँ मीमांसा न केवल विश्लेषण है अपितु एक प्रतिबिम्ब भी बनाती है| इस संदर्भ में मैं अपनी विचार करने की, सोचने की, कोई कार्य करने की शैली पर भी विचार – विमर्श करता हूँ | यहीं से self-reflexivity की बात आ जाती है| और, ये दो तरफ़ा होता है, जैसे हम शीशे में देखते है, तो हमें अपना प्रतिबिम्ब दिखता है| पर शीशा तो स्थूल होता है, और जो असली reflection हमारी चेतना में होता है, वो प्रवाह होता है| ये हमें अध्यात्म की तरफ ले जाता है| एक शिक्षक होने के लिए अपनी इस inner governmentality को समझना बहुत जरूरी है, और reflection एक महत्वपूर्ण जरिया है|  

मैं प्रशासनिक ठेकेदारी और हेकड़ी को लेकर हमेशा नाराज रहता हूँ| यहाँ पर जितना पैसा आता है सब बच्चों के लिए आता है और जो भी लोग नौकरी में है वो सब के सब भी बच्चों की वजह से ही हैं| फिर भी बच्चों के लिए अगर एक पैसा भी खर्च करना होता है तभी पूरा का पूरा भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक गणराज्य का ढांचा आता है | इसके अलावा यहाँ खबीस की औलादों का राज चलता है | अब इस परिस्थिति में मैं क्या करूँ? या, कहाँ से शुरू करूँ? और मेरे लिए सबसे सहज जवाब “मैं” होता है | इसलिए शुरुआती दौर में एक बड़ा हिस्सा बच्चों के साथ किताबें आदि खरीदने में चला जाता था| क्यों कि कड़वी हकीकत ये है कि मेरे पास जो कुछ भी है वो असल में मेरे बच्चों का ही है, मैं ज्यादा से ज्यादा उसका एक संरक्षक (custodian) हो सकता हूँ | वो चाहे पैसा हो, किताबें हो, संस्था हो, या मेरे पास जो भी बुद्धि, विवेक, ज्ञान हो, सब उन्हीं का है, उचित समय के साथ यथोचित रूप में उनको देते जाना ही मेरा धर्म है | इसके अलावा सब व्यवस्थागत स्वांग (systemic farce) है |  

इसके साथ – साथ समाज सेवा नामक इस अपराध में शामिल हम लोग जो रात – दिन प्यार, करुणा, दान, साझा, सशक्तिकरण, परिवर्तन, समानता, न्याय जैसे मूल्यों की बात करते रहते हैं उसका कोई अंत है, कोई व्यवहारिक अभिसरण है, कोई अभ्यास है ? या सिर्फ बातें हैं या अधिक से अधिक कुछ कर बचाने के चक्कर में शोषणकारी नियमों के दायरे में कुछ चवन्नी देकर अपने चरित्र पर लगे दाग का जश्न मानते रहेंगे |

पिछले कुछ वर्षों में मैं कई जगहों पर गया, बहुत से लोगों से मिला| कुछ योजना से कुछ संयोग से, इसमें से एक बड़ा हिस्सा मैंने देश के बड़े भू – भाग व्याप्त नक्सलवादी हिंसा को समझने के लिए किया | क्यों कि गलत या सही पर आजादी के बाद ये एकमात्र घटना है जो आंतरिक क्षेत्रों में स्थापित अव्यवस्था, बेचैनी, तड़प, अधीरता को बाहर तक लाती है | और मैंने लोगों को सालों साल तक साक्षात्कार किया है | बहुत से लोगों से सिर्फ कुछ मिनट या घंटों तक ही बात हुई है | इस सबमें जो एक सबसे प्रमुख रनिंग थीम रही है, बुद्धि कितनी भी चतुर हो, चपल हो, तार्किक हो, व्यक्ति का निर्धारण तो आखिरकार उसके चरित्र, गुण, आत्मबल और जीवनचर्या से ही होगा | एक से एक बड़े – बड़े दिग्गजों के प्रति आम लोगों की प्रतिक्रिया सिहरन पैदा करने वाली रही है | और इसमें कोई दो राय नहीं है ये सब लोग आज न सिर्फ देश में बल्कि विदेश में भी भारतीय सामाजिक न्याय के पुरोधा हैं और इनके संघर्ष पर भी कोई प्रश्न नहीं है | न ही मेरे किसी respondent ने इनके खिलाफ एक शब्द बोल है | परंतु कुछ बातें हमें हटकर समझनी होती है | जैसे कुछ भी बोलते समय भाव क्या है ? और भाव यानी भव और भव ontology है, अस्तित्व का परीक्षण है | एक अजीब सा संशय, हिकारत, व्यंग कि बड़े आए …. बने फिर रहें हैं, ऐसे करता है| जैसे आंध्र प्रदेश के इलाके में ये एक बात बार – बार सामने आई है, कि परीक्षा की घड़ी आने पर अपना रूप बदल लिया यानी सशस्त्र राजनीतिक क्रांतिकारी से कोई और रूप धर लिया गया | बंगाल के इलाके से एक पाखंड और धोखेबाजी की महक मिली है | इसमें कोई दो राय नहीं है कि कुछ लोग हथियार लेकर जंगलों में घुस गए और आज 40 साल से ज्यादा का समय हो चुका है वो कभी बाहर नहीं आए पर उनकी शूर वीरता पर फिर कभी….  

माध्यम : शिक्षा की बर्बादी की कहानी

कहते हैं मुसीबत में ही गलत – सही की अपने – पराए की असली पहचान होती है | और, कोरोना ने वही किया है | हमारी “पोल” खुल गई है | एक तरफ जहाँ हमारी सांसारिक व्यवस्था जैसे सरकार, व्यापार, विज्ञान, आदि असफल साबित हुए, तो दूसरी तरफ धर्म, अध्यात्म, त्याग, प्रेम, करुणा जैसे जीवन मूल्य खोखले ही साबित हुए है |

इसके बीच में सबसे निराशाजनक व्यवहार मानव जीवन के इन दोनों  आयामों को जोड़ने, संतुलित और व्यवस्थित करने वाली कड़ी की यानि, ‘शिक्षा’ ने किया है| हमारी परिस्थितियों आए में बड़े परिवर्तनों एवं नई तरह की समस्याओं को बाकी पहलुओं ने तो थोड़ा बहुत माना या मानने को बाध्य हुए परंतु शिक्षा ने अपनी हेकड़ी दिखाते हुए इसको एक सिरे से नकार दिया है | अपनी कर्कश आवाज में घोषित किया, ‘बच्चों की सीखने की प्रक्रिया नहीं बाधित होनी चाहिए|’ इस व्यवहार को विकसित करने में डिजिटल तकनीकी पर शिक्षा के अटल विश्वास ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है| लॉक डाउन शुरू होते ही तुरंत “ऑनलाइन” माध्यमों की तरफ पलट लिए | एक अजीब सी जल्दबाजी, असुरक्षा, और खोखलापन लिए हुए इस तरीके ने खूब चर्चाएं बटोरी हैं | एक तरह से डिजिटल ही शिक्षा के लिए अंतिम विकल्प मान लिया गया और सबकुछ “सामान्य” दिखाने की कोशिश करी जाने लगी |

जबकि सच क्या है ? शायद ही इस देश में कोई हो जिसे सच नहीं पता है | एक तरफ जहाँ एक बड़ा तबका लॉक डाउन के कारण सड़कों पर चलने लगा, दूसरी तरफ एक बड़ा तबका किसी भी प्रकार के डिजिटल आदि साधनों से कोसों से दूर है | और जो लोग इसे किसी तरह सहन भी कर सकते हैं, उनकी हालत भी बड़ी दयनीय है | खैर, अंत में हम एक सभ्य संवेदनशील लोकतांत्रिक राष्ट्र होने की उड़ान भरते हैं | और, इस तरह से हमने एक और श्रेणी निर्मित कर ली, ‘ऑफलाइन’| अब जब मानक ही ऑफ लाइन है तो सुविधाएं भी ऑफ ही हैं | कभी भोंपू, कभी रेडियो, कभी शिक्षक को गाँव में जाकर पढ़ाएगा, कभी गाँव से ही हाई स्कूल से ऊपर पढ़े हुए युवा स्वयं सेवक के रूप में काम करेंगे, कभी शिक्षक को मोबाइल फोन पर गैर – सरकारी संस्थाओं के कुछ वीडियो कंटेन्ट ले जाकर दिखाना है| और ये सब करने में शैक्षणिक गंभीरता का पूर्ण रूप से दरकिनार कर दिया गया है | कंटेन्ट, पेडागाजी, बाल मनोविज्ञान, समझने की क्षमता, सीखने – सिखाने की  प्रक्रिया सबकुछ एक तरह से बाबुओं के कार्यालयों में रखे हुए कचड़े के डिब्बे में डाल दिया गया है| बस, कुछ भी करो और उसे शिक्षा का, सीखने का नाम दे दो |    

हालाँकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि हम सब पहली बार ऐसी त्रासदी से रूबरू हुए हैं | परंतु, ये हमदर्दी तब ही दिखाई जा सकती है जब सामने वाले में भी थोड़ी विनम्रता हो | अब जब सामने एक दंभी हो तब आपकी कोई भी नरमी कायरता ही दिखती है | असल में जो लोग थोड़ा सा भी हमारी शिक्षा व्यवस्था से सरोकार रखते होंगे, उनको ये सर्कस समझने जरा भी परेशानी नहीं होगी | हम हर बार अपनी शैक्षणिक संकट से निबटने के लिए एक नया माध्यम लेकर आ जाते है | जैसे डिजिटलीकरण, कुछ अन्य फैन्सी वस्तु, कंप्यूटर आदि | परंतु हमें ये समझना पड़ेगा क्या प्रौद्योगिकी प्लेग की तरह एक महामारी का रूप ले चुकी हमारी पाठ्यचर्या एवं स्कूली शिक्षा की समस्याओं का जवाब हो सकती है? इस पर विश्वास करना अविश्वसनीय भोलापन है | प्रौद्योगिकी मस्तिष्क की अपनी आंतरिक संरचना का ही एक आंशिक रूप से बाह्यकरण है | जिसे उपलब्ध परिस्थितियों एवं पदार्थों में प्राप्त किया जाता है | इसके पास मानव को जवाब देने की क्षमता नहीं है और अब जब मानव को प्रौद्योगिकी से बदलने का प्रयास किया जा रहा है तब हम असल में अपने बुनियादी मानवाधिकार को खो चुके हैं | आज जब हम एक बड़ी मानवीय त्रासदी से गुजर रहें है, हमें एक दूसरे के सहयोग और साथ की आवश्यकता है तब शिक्षा के द्वारा ऑनलाइन जैसे माध्यम का अपनाना एक अक्षम्य अपराध है | इस अमानुषीकरण की प्रक्रिया को अपनी सफलता के तौर पर देखना न सिर्फ हमारे बौद्धिक भ्रष्टाचार एवं मानसिक अश्लीलता का प्रतिबिंब है, अपितु, हमारी गुलामी करने वाली सोच का दर्शन भी है | आज भले हम अपने आपको सांत्वना दे रहें हो, परंतु असल में ये हमने भविष्य के बहुत बड़े खतरे का स्वागत किया है | जहाँ मानव संबंधों की परस्परता को समाप्त कर एक मशीनी युग की शुरुआत होगी और हमारी कक्षाएँ जो असल में हमारे समाजीकरण का एक बड़ा माध्यम हैं उनको एक स्क्रीन से बदला जा रहा है | इस खतरे की ओर हाल में आई नई शिक्षा नीति भी पूर्ण से खरीदते हुए दिखी |

दूसरी बात, राजधानियों और मुख्यालयों से आने वाले आदेश कभी कोई जमीनी परिवर्तन नहीं ला सकते हैं | लगातार माध्यम बदलना या नए – नए प्रशिक्षण करना किसी समस्या का समाधान नहीं है | अपितु, ये सब करने से आज शिक्षक अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों के प्रति भी भ्रमित हो चुका है| जैसे उसे बच्चे को गिनती को सिखानी है, अब एक तरफ तो उसके पास राज्य शासन द्वारा निर्धारित व्यवस्था है, जिसका उसे अनुपालन करना ही है| तो दूसरी तरफ कई गैर – सरकारी संस्थाओं की गतिविधियाँ है| अन्त में उसे इनके लिए भी कागजी कार्यवाही पूर्ण करनी ही होती है | जबकि, कड़वी सच्चाई ये है कि, उस शिक्षक में बच्चे को गिनती पढ़ाने की बुनियादी क्षमता है ही नहीं, और न कभी विकसित की गई है |  जब तक हम इस सच को नहीं स्वीकार करेंगे, आगे बढ़ पाना असंभव है | ये बात थोड़ी अतिवादी लग सकती है | पर हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था, शिक्षक शिक्षण व्यवस्था, शिक्षण सेवा के पूर्व व दौरान की प्रशिक्षण व्यवस्था, मूल्यांकन एवं सहयोग के ढाँचे की स्थिति देखने के बाद किसी शंका की गुंजाइश नहीं रह जाएगी | और अगर थोड़ा बहुत बचती है, तब हम कुछ और पहलुओं पर गौर कर सकते हैं | जैसे शिक्षक कौन बनता है ? सेवा में आने वाले शिक्षकों की योग्यता, चयन प्रक्रिया, और उन्हें मिलने वाले आर्थिक एवं अन्य लाभ क्या हैं ?  आज कोरोना काल में भी यही हो रहा है लगातार नए – नए माध्यमों को अपनाने की आजमाइश चल रही है  | पर कोरोना से उपजती नई समस्याओं के मूल समस्या यानी शिक्षक की क्षमता एवं व्यवस्था का ढाँचा सबसे बड़ी समस्या है | 

कोरोना ने हमारी इस परिस्थिति को पूर्ण रूप से बेनकाब कर दिया है | लगातार नए – नए आदेश निकाले जा रहे हैं, या नए – नए ऑनलाइन – ऑफलाइन कंटेन्ट को मुफ़्त इंटरनेट से बांटा जा रहा है, पर इससे जमीनी स्तर पर कुछ भी हरकत होने की गुंजाइश तक नहीं बची है | आखिर में जिम्मेदार लोग ये क्यों नहीं समझने की कोशिश कर रहें हैं, जब, हम सामान्य समय में अपनी शिक्षण व्यवस्था कभी उचित रूप से नहीं चला पाए हैं | कभी पाठ्यक्रम सहजता से नहीं पूरा कर पाए हैं | तब आज शिक्षा बेलगाम नौकरशाही जैसा व्यवहार दिखाकर क्या साबित करना चाहती है ? इससे सिर्फ जनाक्रोश बढ़ रहा है और जो थोड़ा बहुत अच्छे काम की गुंजाइश बचती है वो भी समाप्त होती जा रही है | शिक्षक एवं अन्य जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ अपने को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहें हैं |

हमें ये समझना पड़ेगा की हम किस तरह की मानवीय संकट से गुजर रहें हैं | दूसरी तरफ हमारे शैक्षणिक परिदृश्य की सच्चाई क्या है ? इस सबके बीच शिक्षा की जिम्मेदारी क्या है, जवाबदेही कहाँ है ? कोर्स पूरा करने में, आधिकारिक प्रणाली और प्रोटोकॉल का पालन करवाने में, या कहीं और?

सच ये है कि आज हम अपनी शैक्षणिक जटिलताओं का सामना करने में पूर्ण रूप से अक्षम हो चुके हैं | हम कुछ भी बात कर लें परंतु ये हमारा ‘सामूहिक सामाजिक अपराध’ है जो प्रत्येक वर्ष आने वाली विभिन्न सरकारी और गैर – सरकारी रिपोर्टों में झलकता है | हम दिवालिया हो चुके हैं, सोच – विचार के स्तर पर, चिंतन – मनन के स्तर पर, नैतिकता के स्तर पर, बुद्धि के स्तर पर| और इस पूरे पाखंड की सबसे कड़ी सजा भुगत रहा है एक मासूम जिसको कुछ पता ही नहीं है, यानी कि, बच्चा…… 

Corona and quest

Perhaps this is right time to re think on our civilizational role & responsibilities towards our own and world as well. We are suffering from a civilizational crisis, if we believe in provided history, then after a century we are forced to face such profoundly unsettling realties of contemporary time. There is situation of globalized civil war. In fact, in our living rooms….
The masters of modern world transformed private experiences into public experience and make fantasize whole world about newer and newer system of weapons and worship of apocalyptic death. These masters have technology, mercenary, nuclear and arsenal and most importantly “free” markets, global financial institutions. They have weapon to finish this world for four times in few hours but they don’t have simple life saving kits, syringes, gloves, masks etc. and, most funny thing is tussle on medicine hydroxychloroquine by god father of world. We simply use it as ‘malaria clean’ and always utilization is topic of bully and mockery for us.
And, now, (e )state and politics as well, just providing immunity to the establishments. It is the war, criminality and power masquerading as politics, shaping space, time, language, and economics of daily life while world is watching it silently.
And, this makes me to believe there is no point in blaming our so – called leaders, the representatives of the politics of power to whom we elect with the futile ballot machine, are, and have always been morally, spiritually, intellectually, and existentially bankrupt. The bankrupt has no accountability. They cannot give an account of themselves other than repeating ad nauseam the set of self-serving and hypocritical phrases, the global anesthetic that allows them to rule. It is no longer a question of the Right or the Left or the Center; such distinctions have no meaning anymore. All we can do now is to somehow make these so-called leaders (and all leadership) irrelevant. That is the only thing left for us to do if we are to get out of the plantation and begin a new history of creative labor.

Power: Humility – Toxicity

For me society is divided in two extremes. One says, ‘power matters.’ Other says, ‘experiences and skills matters.’

But I find first one is right, ‘power matters.’ Maybe I look improper to many, specially to monstrous elites, who are covering themselves in veil of ‘social goods’ and ‘infantilize masses’ from last 70 years on the name of secularism, socialism, democracy and now running an industry named as ‘social change’.

Here it’s been almost six years we are working Southern Bastar region of Central India. We have very rigorous engagements with operations and systems and residential schools. We personally more interested in classrooms, exploring pedagogical angles and moving existing curricular frameworks as a ‘teacher’. Without any exaggeration and self – glorification, I can say we are the one in this nation who understands very well schooling systems, classrooms, children, teacher and communities. Even more than “IAS” officers and special consultant of government. As well as, we have fair understanding of most pressing issue of this country, to what civilized society call ‘Naxalism’.

Despite, having all set of required skills, varied range of experiences, engagement with varying combination and effect on/f educational horizon, we are one of the most ignored, humiliated, marginalized set of people. Interestingly, this process of annihilation is being done by the set of people, who are enjoying all the privileges and accumulation on the name of ‘responsibility to greater good of society’.

It looks me very funny also, when people who enjoy luxury, on public resources, accuse me to be ‘corrupt’. I am a person, who don’t have enough money to buy a ticket for going to his home, even if my parents die… the people who are making us ‘culprit’ and ‘villain’, takes 15 leaves from there office without any prior information or plan, on monthly basis. For 15 days they are ‘Turk’.

Contd…

????

गाँव में एक कहावत है, किसी की आह मत लो,

और ये आधुनिक लोकतंत्र, साम्यवाद, वाम, दक्षिण, हिंदी, हिन्दू, संस्कृति, सभ्यता सब का सब ‘लोग’ एवं उनके ‘लोक’ को कुचलकर बना है|

ये कितनी भी कोशिश कर लें, पर कभी सुकून से नहीं रह सकते|

चाहे मोदी भगाओ, राहुल लाओ, चाहे गोडसे को गरियाओ या नेहरु को पूजो कुछ नहीं होगा|

जे.एन.यू. से सेक्युलरिस्ट को हटाकर हिंदुवादियों को बिठाओ, तब भी कुछ नहीं होगा|

धर्मनिरपेक्षता तो नहीं हो सकती भारत में, पर आप जिस धर्म की बात कर रहे है उसके सापेक्ष भी नहीं है ये देश|

जिस धर्म के सापेक्ष ये देश था, वो न गीता में है, न कुरान में,

वो लोगो के जीवन में और उनके लोक में बसता था|

पर उसको आपने कुचल दिया, अब बहुत देर हो चुकी है|

जिन लाखों करोड़ो लोग को कुचलकर और उनके हजारों लोक को खत्म कर आपने ये राष्ट्र, भाषा और संविधान बनाया है, उसको ये आहे कभी सुकून से नहीं रहने देंगीं|

और इसी कुचलने की आवाज को नक्सलवाद जैसे नाम दिये जाते है…….